लोकसभा चुनाव: हरियाणा में सवा शेर कौन खट्टर या हुड्डा, प्रत्याशियों के साथ इनकी किस्मत भी हो जाएगी ईवीएम में बंद
नई दिल्ली। रविवार सुबह सात बजे से हरियाणा में लोकसभा की 10 सीटों के लिए मतदान जारी है। लेकिन इस चुनाव में प्रदेश के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह का सियासी करिअर सबसे ज्यादा दांव पर लगा है। भाजपा और कांग्रेस के दोनों नेता इस बार पार्टी के अंदर से मिल रही चुनौतियों से परेशान हैं। यही कारण है कि लोकसभा चुनाव में जीत का दोनों के लिए समान रूप से सियासी अहमियत रखता है। यानि अंदरुनी और बाहरी दोनों स्तर पर चुनौतियों की वजह से सीएम खट्टर व उनके पूर्ववर्ती कांग्रेस नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा के लिए इस बार करो या मरो की स्थिति है।
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मोदी और शाह के भरोसे के बनाए रखने की चुनौती
खट्टर के लिए करो या मरो की स्थिति इसलिए है कि 2014 में वो मोदी लहर में हरियाणा विधानसभा चुनाव में प्रचंड जीत मिलने के बाद सीएम बनाए गए थे। उन्हें संघ और पीएम मोदी का पसंद माना जाता है। इसलिए उनके ऊपर लोकसभा चुनाव में पार्टी की जीत को दोहराकर पीएम मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के भरोसे को बनाए रखने की भी चुनौती है। बेहतर प्रदर्शन इसलिए भी जरूरी है कि छह महीने में हरियाणा विधानसभा के चुनाव होने हैं। सीएम मनोहर लाल ने इससे पहले भाजपा और संघ के संगठन में सक्रिय रूप से काम किया था। मगर शासन-सत्ता का काम उन्होंने पहली बार संभाला। पिछले साढ़े चार साल के दौरान उन्हें कई मोर्चों पर सियासी मुसीबतों का सामना करना पड़ा है।
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सभी सीटों पर जीत का लक्ष्य
भाजपा नेतृत्व ने 2014 के मुकाबले इस बार प्रदेश में लोकसभा की सभी 10 सीटों पर जीत का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य को हासिल करना खट्टर के लिए असंभव लगता है। भाजपा में लोकसभा में धमाकेदार जीत इसलिए भी जरूरी है कि कुछ महीने बाद यही जीत हरियाणा में विधानसभा चुनाव में जीत की नींव रखेगा। यही वजह है कि पार्टी ने पूरी ताकत झोंकी हुई है। इस बार राहत की बात ये है कि भाजपा के पास मोदी के अलावा राज्य में मनोहर लाल खट्टर का भी चेहरा पार्टी के पास है। पांच नगर निगमाेें के मेयर और जींद उपचुनाव में भाजपा की जीत पर दौड़ाएं तो राज्य के गैर जाट मतदाताओं ने मनोहर लाल की ईमानदार छवि पर अपनी मुहर लगा दी है।
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हैं हुड्डा के लिए सबसे बड़ी चुनौती
दूसरी तरफ 2014 में मिली हार के बाद से हरियाणा कांग्रेस खेमेबाजी में बंटी हुई है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अशोक तंवर से उनका छत्तीस का आंकड़ा जगजाहिर है। तंवर को राहुल गांधी की पसंद और युवा चेहरा माना जा रहा है। यही कारण है कि वो भूपेंद्र सिंह हुड्दा के लिए चुनौती बने हुए हैं। हालांकि लोकसभा चुनाव का बिगुल बजने के बाद प्रदेश प्रभारी और राष्ट्रीय महासचिव गुलाम नबी आजाद ने गुटों में बंटे नेताओं को समन्वय समिति बनाकर एकजुट करने का प्रयास किया। मगर यह समिति कितनी कारगर होगी यह लोकसभा चुनाव परिणाम से पता चलेगा।
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सोनीपत से चुनावी मैदान में है हुड्डा
प्रदेश कांग्रेस पर पकड़ को बनाए रखने के लिए कांग्रेस नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा सोनीपत से और उनके बेटे दीपेंद्र हुड्डा रोहतक से चुनावी मैदान में हैं। सोनीपत में हुड्डा समर्थक नेताओं ने चौधर की लड़ाई को चुनावी मुद्दा बनाने का प्रयास किया है। हुड्डा समर्थक कह रहे हैं कि उनके नेता सांसद बनने के बाद विधानसभा चुनाव लड़ेंगे और प्रदेश का मुख्यमंत्री बनेंगे।
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